कुछ अपनी, कुछ दुनिया की
Sunday, August 1, 2010
lakh takleefen sahi par
लाख तकलीफें सही पर
अब चलो हम मुस्कुराएँ
घाव सीने में लगे हैं
हो गयी है पीर गहरी
जिंदगी ऐसी कि जैसे
जेठ कि तपती दुपहरी
पर चलो हिम्मत करें हम
फूल की बगिया लगायें
लाख तकलीफें सही पर
अब चलो हम मुस्कुराएँ
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